May 20, 2012

जाने कहा गए वो दिन....



कल
 शाम को खाना खाने के बाद मैं जैसे ही अपने कमरे में आया और लैपटॉप चालू किया ही था की लाइट चली गयी . फिर हम सभी दोस्त लोग बाहर बेठे हुए बिजली वालो को कोश  रहे थे . और कोशते भी क्यों  हमारे सारे   काम रुके पड़े थेकिसी को इन्टरनेट करना थाकिसी को टीवी देखनी थी और किसी को खाना खाना थामैं बैठा बैठा सोच रहा था की हम सच मुच कितने ज्यादा निर्भर हो गए हैं बिजली पेफिर मेरा ध्यान मेरे आसपास की दुनिया पे गया और फिर मुझे लगा की क्या सचमुच जो भी Invention  हुए हैं उनसे हमारा रहन सहन का स्तर सुधरा है????
यही सोचते सोचते मुझे अपनी नानी का गाँव याद आया और मैं एक फ्लशबेक में चला गया वहां आज जैसी कोई सुविधा  थी पर एक सुकून था . आज वही की कहानी कहूँगा . कहानी सच्ची है तो सब कुछ सच सच् ही लिखूंगा.
तो ये बात तब की है जब मैं क्लास  या   में पड़ता थाहम वार्षिक परीक्षा के बाद वाली गर्मी की  छुट्टी का बेसब्री से इन्तेजार करते थेवो  महीने की छुट्टी मानो जन्नत हुआ करती थी . हम अपनी छुट्टियाँ बिताने अपने नाना के घर जाया करते थेउस समय मोबाइल फ़ोन प्रचालन में  नहीं थे तो अंतर्देशीय और पोस्ट कार्ड का चलन थाहम जाने के १५-२० दिन पहले नाना को ख़त लिख कर अपने आने की तारीख से अवगत करा दिया करते थे .नाना का गाँव आगरा से कानपूर लाइन पे शिकोहाबाद  पास पड़ता थाचूँकि उस समय वहां बस और टेम्पो ज्यादा नहीं चलते थे तो एक मैनपुरी नामक जगह पर नाना जी अपनी बेलगाडी  के साथ नियत तारीख को पहुच जातेमिलने की जगह फिक्स रहती थी तो अगर हम पहले पहुचते थे तो वो इन्तेजार करते वरना  हम इन्तेजार करतेफिर भरी धुप में घंटा भर बेलगाडी का सफ़र . बेल के  धीरे चलने पर नाना जी का उसे कोशना और कहना " अरे तुझे चमार चीरे ","अरे तुजेह आग लगे" , "अरे बेल है के बकरा हैऔर जैसे बेल उनकी गालियों से motivate होकर तेज चलने लगतागाँव पहुचाते ही दूर से ही जो भी मिलता उसका पापा से दुआ सलाम शुरू हो जाता. और लोग कहते "राम राम सा ". मैं पापा से पूछता की पापा आपको सब जानते हैं तो पापा बताते बेटा ये  manners होते हैं है की कोई भी अपने गाँव  रहा है तो उसका स्वागत करोमैं सोच में पड़ जाता की हम तो अपने teacher को देख के छिप जाते थेकच्चे रास्तों पे चलते हुए खैर जैसे तेईसे हम पहुचाते अपने गाँव . तब तक शाम ढल जाती थी तो चारो तरफ लालटेन और ढिबरी (एक शीशी जिसके ढक्कन में छेद कर के बत्ती डाल कर लालटेन जैसे उपयोग में लाते थे ) दिखाई देने लगतींयहाँ ये बता दू की नाना नानी के यहाँ बिजली नहीं है ही कोई घडी थी उस दौर मेंहमें समय का कोई इल्म नहीं रहता था वहां और शायद जरुरत भी नहीं थीनानी का गाँव थोडा पिछड़ा हुआ है तो वहां लोगों का अपना ही रहन सहन का एक ढंग था . रात को खाने खाने के बाद घर की औरतें घर के अन्दर और पुरुष मकान के बहार चबूतरे पे खाट डाल कर सोते थेचूँकि उस समय संयुक्त परिवार हुआ करते थे तो सब बड़े छोटे मिलाकर १०-१२ पुरुष हो जाते थे सोने वालेकुछ लोग अपने खेतों पे भी चारपाई डाल के सोया करते थेमुझे याद है मेरे नाना के पास एक रेडियो था जिसे वो जान से ज्यादा प्यार करते थे और जब भी मैनपुरी जाना होता उसमे बेटरी डलवा कर ले आते.  नाना के रेडियो में समाचार आते थे और आते जाते लोग उस चबूतरे पे बेथ जाते समाचार सुन ने कोउसके बाद गहन विचार विमर्श होता खबरों पर . मेरा काम बस सुन ने का हुआ करता थारात के समय खुला आसमान हुआ करता था सर पे और मुझे याद है जितने तारे मैंने उस समय गिने होंगे उतने उसके बाद शायद कभी नहीं गिन पाया (अब पता नहीं इसमें दोष मेरी याददाश्त का है या प्रदुषण का ).ठंडी ठंडी हवा चलती और जुगनू उड़ते हुए दीखते . खेतों की तरफ से गीदड़ो और सियारों की आवाजे भी सुन ने को मिल जाती थीसुबह जब नींद खुलती तो आसपास के सभी चबूतरे मिलाकर शायद मैं ही जागने वाला आखरी इन्सान होता थासुबह सुबह लोग खेतों की तरफ जाते दीखतेटोइलेट थी नहीं तो हमें भी आसपास के किसी हैंडपंप से कोई बोतल उठाकर आसपास किसी खेत में जाना पड़ताआज ये सब सोच कर भी अजीब लगता है जबकि उस समय ये सामान्य लगता था . फिर मामा एक दातून तोड़ देते नीम की,तो उसी से ब्रुश हो जाताफिर वापिस आते तो नानी मठा पीने को देती और फिर हम मामा के साथ खेत पे चले जातेदोपहर में जब मामा खेत के लिए मोटर चलाते तो हम भी उसी पानी से नहा लेते . चारो तरफ पेड़चारो तरफ हरयाली . जिसके घर चले जाओ वहां घी लगी रोटियां . हम जाने  जाने सभी हमें जानते थेदोपहर में खाना खा पीकर मामा के ही साथ कही छाओं में खटिया डाल के पड़े रहते .  किताबें थीं वहां ,  टीवी थी कोई और साधन मनोरंजन का पर समय का धयन ही नहीं रहता था . किसी के भी घर में कोई कार्यक्रम होता तो गाँव के ही लड़के खाना परसने में लग जाते . शादी ब्याह के संमय गाँव की ही औरतें पूड़ी बिल्वाने जाती थीं .  शादी वाले घर में गाने बजाने का काम भी गाँव की औरतें ही सम्भाल लेती थींकिसी के यहाँ किसी की death हो जाती तो भी खाना पीना आस पड़ोस से  जाता था . वहां बिजली नहीं थी पर उसकी जरुरत ही नहीं महसूस होती थीटीवी नहीं थी पर आपस की गप्पों में ही समय निकल जाता थापंखे नहीं थे पर भरी गर्मी में भी हाथ के पंखो से काम चल जातावहां घरों के पते नहीं होते बस पोस्ट मास्टर सब को नाम से जानते थे तो हर चिट्ठी नियत जगह पहुच जाती थी.   फ़ोन और इन्टरनेट हुए बिना भी लोग संपर्क में रहते थे खतों के जरिये और ख़त भेजने के बाद जवाब का इन्तेजार करनाउसका अपना ही मजा था. वहां दुनिया छोटी थी पर लोग  दूर दूर तक एक गाँव वालो को जानते थे . आज एक दुसरे से जुड़ने के साधन बाद गए हैं तो हम और दूर हो गए हैं एक दुसरे की जिन्दगी से . आज महानगरों में लोग अपने पडोसी को ही नहीं जानते . आज के बच्चे  मोबाइल फ़ोन और मोटर साइकिल के तो सभी मॉडल जानते हैं पर देश दुनिया की जानकारी ख़तम हो गयी है....
आज सब सोचता हु तो एक सवाल आता है दिमाग में की technology ने हमारी जिन्दगी आसान बनायीं है या हमें कुदरत से और दूर कर दिया.........आप भी सोचियेगा.... 



May 6, 2012

When i was sure...

When i was sure of wining....I LOST....
When i needed people most...THEY LEFT ME...
When i learnt to dry my tears...I FOUND A SHOULDER TO CRY ON...
When i became busy....I GOT FRIENDS...
When I mastered the skill of hating..SOMEBODY STARTED LOVING ME...
When  after waiting for dawn i fell asleep...THE SUN CAME OUT...
Thats my life precisely..