Dec 9, 2020

राहुल सांकृत्यायन -गुणाकर मुले

  1.  सैर कर गाफिल दुनिया की जिंदगानी फिर कहाँ , जिंदगानी गर कुछ रही तो  नौजवानी फिर कहाँ। 
  2. छह महीने का कुत्ता और बारह बरस का पुत्ता।  हुआ सो हुआ गया सो गया। 

लामाओं के देश में

  1. घंटे कितने ही क्यों न हों, समय ठहरता थोड़े ही है। 
  2. डर का कारण मालूम हो जाने डर आधा ही रह जाता है। 
  3. तीर्थयात्रा सहज नहीं होती। 
  4. पृथ्वी में ऐसा कौन सा काम है जो प्रयत्न करने से सफल नहीं हो सकता। 
  5. जितना महत्वपूर्ण हिन्दुओं के लिए काशी  मुसलमानों के लिए मक्का है उतना ही महत्वपूर्ण तिब्बतियों के लिए ल्हासा है। 

विस्मृत यात्री

  1. लोगों को पढ़ने का शौक़ीन होना चाहिए उससे ज्ञान की वृद्धि होती है। 
  2. सामाजिक रूढ़ियों के कारन कितनी ही बातें जो एक देश में चलती हैं दुसरे देश एम् वर्जित होती हैं 
  3. आदमी पहली यात्रा  के लिए जब कदम उठाता है तो उसे कहाँ मालूम होता है की इसका अंत कहाँ होगा। 
  4. मनुष्य की बाल - स्मृति सबसे मधुर होती है 
  5. शाश्त्र पढ़ने से आदमी की ऑंखें खुलती हैं पर उसकी कूपमंडूकता दूर करने के  लिए देशाटन भी आवश्यक है। 
  6.  परिचित होकर ही हम जान सकते हैं कि किस तरह देश और समाज में परिवर्तन हुआ  करते हैं। 
  7. अगर दुःख अकारण होता तो उसे हटाने का प्रयत्न  करना बेकार होता। 
  8. युद्ध भी एक भीषण महामारी है , जिसके आने पर बस्तियां उजाड़ जाती हैं। 
  9. विद्या का आकर्षण घुमक्कड़ी से कम नहीं। 
  10. सभी जगह लोगों की भावनायेँ  लगभग एक जैसी होती हैं। 
  11. मनुष्य प्रकृति से कोमल और उदार हृदय का है पर परिस्थितियां  बना देती हैं। 
  12. आदमी अपने संस्कार और ज्ञान के अनुसार देवताओं को अपनाता है। 
  13. दुनिया की विचित्रता एक जगह रह रहे आदमी को नहीं मालूम होती। 
  14. आदमी जितना अधिक पृथ्वी का पर्यटन करता है  उतना ही अधिक उसकी ज्ञान के विस्तार के साथ जिज्ञासा में भी विस्तार होता है। 
  15. लिपि ही है जो सब जगह एक जैसी समझी जाती है। 

घुमक्कड़ शाश्त्र

  1. घुमक्कड़ी का अंकुर पैदा करना इस शाश्त्र का काम नहीं है बल्कि जन्मजात अंकुरों की पुष्टि , परिवर्धन तथा मार्गदर्शन इस ग्रन्थ का लक्ष्य है। 
  2. घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। 
  3.  घुमक्कड़ी किसी बड़े योग से काम सिद्धि दायिनी नहीं है और निर्भीक तो वह एक नंबर का बना देती है।  
  4. चलना मनुष्य का धर्म है जिसने इसे छोड़ा वह मनुष्य होने का अधिकारी नहीं है।  
  5. महिमा घटी  समुद्र की , रावण बसा पड़ोस। 
  6. घुमक्कड़ी के लिए चिन्ताहीन होना आवश्यक है और चिन्ताहीन होने के लिए घुमक्कड़ी आवश्यक है।  
  7. घुमक्कड़ी में कभी कभी होने वाले कड़वे अनुभव उसके रस  बढ़ा देते हैं।  
  8. पुत्रवती युवती जग सोई , जाको पुत्र घुमक्कड़ होई। 
  9. मन माने तो मेला नहीं तो सबसे भला अकेला। 
  10. आप अपना शहर छोड़िये , हजारों शहर आपको अपनाने को तैयार मिलेंगे।  
  11. तुम अपने ह्रदय की दुर्बलता को छोडो , फिर दुनिया को विजय कर सकते हो।  उसके किसी भी भाग से जा सकते हो ,बिना पैसा कौड़ी के जा सकते हो केवल साहस की आवश्यकता है , बाहर निकलने की आवश्यकता है  वीर की तरह मृत्यु पे हंसने की आवश्यकता है।  
  12. समय समय पर केवल उतना ही पैसा लेकर घूमना चाहिए की भीख मांगने की नौबत न आये और साथ ही भव्य होटलों में ठहरने को स्थान न मिल सके। 
  13. जिसमे आत्मसम्मान का भाव नहीं वो कभी अच्छे दर्जे का घुमक्कड़ नहीं हो सकता।  
  14. लेखनी, पुस्तकी, नारी परहस्तगता गता। 
  15. अनाडी आदमी शास्त्र के साथ अच्छा व्यव्हार करना नहीं जानता। 
  16. उचकोटी का घुमक्कड़ दुनिया के सामने लेखक, कवी या चित्रकार के रूप में आता है। 
  17. घुमक्कड़ लेखक बनकर सुन्दर यात्रा साहित्य प्रदान कर सकता है। 
  18. नवीन स्थान में जाने का यह गुर ठीक है की लोगों को जैसा करते देखो उसकी नक़ल तुम भी करने लगो।  
  19. हमारे देश की तरह दुसरे देशों में भी कई जातियां ऐसी हैं जिनका न कोई एक घर है न गाँव। 
  20. दो स्वछंद व्यक्ति एक दुसरे से प्रेम करें यह मनुष्य की उत्पत्ति के आरम्भ से होता आया है। 
  21. प्रेम रहे पर पंख भी साथ में रहें।  
  22. यदि जीवन में कोई अप्रिय वास्तु है तो वह मृत्यु नहीं बलिक मृत्यु का भय है। 
  23. बिना किसी उद्देश्य के पृथ्वी पर्यटन करना , यह भी कम उद्देश्य नहीं है।

Sep 21, 2020

गांव की बेटी

 

घटना कुछ सालों पुरानी है जब संचार क्रांति नहीं आयी हुयी थी और ज्यादातर गांव कच्ची सडकों द्वारा ही जुड़े हुए थे शहरों से और बैलगाड़ियां एक मुख्य साधन थीं आवागमन का ।  उत्तर प्रदेश के इक छोटे से गांव में रहने वाली सुलोचना की शादी रेलवे में कार्यरत सुरेश से ०२ साल पहले ही  हुई थी ।  ०३ महीने पहले ही बच्चा हुआ था अचानक बाबूजी की तबियत ख़राब होने का तार मिला और तार मिलते ही दोनों लोग अपने ०३ महीने के बच्चे को निकल पड़े थे । पहले झाँसी से ट्रैन से आगरा आये थे फिर रोडवेज की बस से जसराना आ गए थे । अब यहाँ से गांव लगभग ०५ किलोमीटर दूर पड़ता था सामान्यतः तो चिट्ठी भेज देने से बैलगाड़ी यहाँ सूर्यास्त तक इंतजार करती थी इस बार थोड़ा ज्यादा ही लेट हो गए तो जसराने आते आते ही अँधेरा हो चला था । रात के लगभग ११ बज गए थे , अब दोनों पति पत्नी अपने नवजात  बच्चे को लिए हुए तेजी से चले जा रहे थे पति के हाथ में सामान का बैग था और पत्नी की गोद में ०३ महीने की  बच्ची थी ।  

सर्दी का समय था अँधेरा हो गया था और डाकू बहुल क्षेत्र होने के कारण अब कोई वाहन मिलना मुश्किल ही था दिन का समय होता तो तो कोई ना कोई ट्रेक्टर या बैलगाड़ी मिल ही जाती  पर अब तो ५ किलोमीटर पैदल ही तय करना था ।

स्याह अँधेरी अमावस की रात और डाकुओं का डर , दम्पति डरते डरते चले जा रहे थे । आसपास खेत और घने पेड़ थे । लगातार चोरी और डाके की खबरें वो लोग सुनते ही रहते थे इस क्षेत्र में वो लोग । ये  क्षेत्र डाकुओं की कहानियों से भरा पड़ा था ।  ये डाकू आसपास के गॉंवों से ही आते थे, दिन में गांवों में ही आम जिंदगी जीते थे और रात में चोरी और लूट का काम करते थे । ये भी सुनते थे की कभी कभी डाकू ज्यादा सामान न मिलने पर लोगों को जान से मार देते हैं । हम इंसानों का एक मूलभूत स्वभाव होता है की जब भी कोई विपत्ति में पड़ते हैं तो हमेशा किसी और कसूरवार ठहरना चाहते हैं उसी तरह इस विपत्ति की घड़ी में सुरेश सुलोचना के गांव को कोसता हुआ जा रहा था साथ ही उस लम्हे को कोस रहा था जब इस गांव की लड़की से शादी की और आज ये विपत्ति की घड़ी देखनी पड़ रही है । सुलोचना चुपचाप सब सुनते हुए चली जा रही थी ।

खैर, कच्ची सड़क पे दोनों पति पत्नी किसी अनिष्ट की आशंका के साथ चले जा रहे थे ।  अचानक पास की झाड़ियों में कुछ  सरसराहट हुयी दम्पति ने एक दुसरे की और देखा और थोड़ा तेजी से चलना शुरू कर दिया । अचानक सरसराहट बढ़ गयी और फिर एक टोर्च की रौशनी चमकी और ४-६ लोग दाएं बाएं तरफ से सड़क पर आ गए । दम्पति को मानो काटो तो खून नहीं, ०२ डाकू उनके दाएं खड़े हो गए और ०२ उनके बाएं खड़े हो गए ०१ सामने खड़ा था उसके पीछे अँधेरे में कम्बल लपेटे हुए एक और डाकू खड़ा था ।

सभी डाकू हाथ में हंसिया और लाठी लिए थे बस कम्बल वाला आदमी एक बन्दूक लिए हुए था और हावभाव से वो इनका सरगना मालूम होता था ।

डर के मारे पति पत्नी की घिग्घी बंधी हुई थी तभी आगे खड़े डाकू ने टोर्च की रौशनी सड़क पे मारी और उस रौशनी में एक अंगोछा सड़क पे बिछाया और दम्पति की ओर देखकर चिल्लाया जो भी सामान नकदी गहने वगैरह हों इस पर रख दो । पति पत्नी तो डरे हुए थे, पति सोच रहा था कैसे भी जान छूटे आज । पति ने अपना पर्स, घडी और जो थोड़ा नकद रखा था जेब में वो अंगोछे पे रख दिया ।

डाकू :बस इतना सा सामान ? मजाक है क्या ये ?

(अब पति पत्नी डर गए इन डाकुओं का कुछ भरोसा नहीं होता यहीं लूटपाट करके मार के डाल देते हैं मुसाफिरों को)

 डरते डरते पति बोला : भैया अब कुछ है नहीं हमारे पास ।

डाकू बोला: बेवकूफ समझते हो हमें ?

आदमी की बोलती बंद थी, महिला की भी आँखों में डर के मारे आंसू आ रहे थे बच्ची भी भूख से व्याकुल हो रोने लगी ।

महिला डर से कंपकंपाते बोली: भैया, जो कुछ था यहीं रख दिया बड़ी दूर से आ रहे हैं हम । पिताजी की तबियत की खबर सुनी तो भैया जैसे बैठे थे ऐसे ही भागे । शादी के बाद से गॉंव नहीं जा पायी हूँ अभी   बच्चा होने के बाद ०३ साल में पहली बार अपने घर जा रही थी आते आते लेट हो गए भैया जाने दो हमें ।

डाकू ने अपने सरदार की तरफ देखा , सरदार ने कुछ इशारा किया तो डाकू सामान उठाते हुए बोला ठीक है जाओ, कौन सा गांव है तुम्हारा ?

महिला बोली : जसरामपुर ।

गांव का नाम सुनते ही सामान  समेटते हाथ एक दम ठिठक गए और वातावरण में एक निस्तब्धता सी छा गयी । उसने अपने सरदार की तरफ देखा , सरदार दो कदम आगे आया पहली बार उसका चेहरा हल्का सा दिखाई दे रहा था उसने पूछा : किसके घर जाना है जसरामपुर  में ?

महिला: भैया मास्टर साब के यहाँ 

सरदार: मास्टर रघुबीर सिंह?

महिला: हाँ भैया । 

सरदार ने अपने साथी को पास बुलाकर फुसफुसाते हुए कुछ कहा, उसने सारा सामान पति को दे दिया

(पति पत्नी दोनों को कुछ समझ नहीं आ रहा था की ये क्या हुआ? )

सरदार ने नवजात बच्चे की तरफ इशारा करके पूछा ये तुम्हारा बेटा है की बेटी?

महिला: बेटी है भैया ।

सरदार ने अपने साथी को कुछ इशारा किया और जाने के लिए मुड़ गया ।

डकैत महिला के पास आया और बच्चे के हाथ में कुछ रख दिया सभी डाकू जाने के लिए मुड़े तो पति ने पूछा भैया आपके सरदार ने क्या बोला था आपको ?

डाकू बोला: सरदार ने कहा की जाने दो इनको अपने गांव की बेटी है ।  

(इसके बाद डाकू चले गए पति पत्नी चुपचाप अपने रस्ते चल दिए )

अचानक महिला को याद आया तो उसने बच्ची का हाथ टटोला । देखा की बच्ची की हाथ में ५१ रुपये थे , पति ने आश्चर्य से पत्नी की और देखा तो पत्नी बोली चूँकि मैं उनके अपने गॉवों की बेटी हूँ और उसने पहली बार बेटी को देखा तो नेग दिया है

पति पत्नी अपनी किस्मत पे भरोसा नहीं कर पा रहे थे और ईश्वर को लाख लाख धन्यवाद देते हुए गांव की ओर चले जब गांव की लालटेन दिखना शुरू हुईं तब सुरेश रुका ओर मुड़कर बोला आज तुम्हारी इस "गांव की बेटी" वाले डाकू ने मेरी ऑंखें खोल दीं मुझे नहीं पता था की आज भी गांव वालों के संस्कार जिन्दा हैं । सुलोचना मुस्कुरा दी, सामने वो गांव था जिसकी वो बेटी है । । 

Sep 16, 2020

इसको इस्पात संयंत्र से जुड़ी एक यादगार घटना

 


बात जुलाई २०११ की है , मैं एक निजी इकाई में मुंबई में  कार्यरत था और एक कार्य के सिलसिले में आसनसोल (पश्चिम बंगाल) आना पड़ा उस समय अकसर इस तरह की आधिकारिक यात्राओं पर जाना पड़ता था और मेरा स्वभाव थोड़ा घुमक्कड़ किस्म का था तो मेरा एक नियम था कि  अपना आधिकारिक  कार्य निष्पादित करके मैं उस जगह को घूम लिया करता था रविवार की रात को अपना कार्य ख़तम करके और ०२ घंटे की नींद लेकर आसनसोल घूमने की योजना बनायीं इंटरनेट पर देखने पर मालूम हुआ कि यहाँ कुछ उद्यान हैं कुछ बांध हैं और इक बड़ा इस्पात संयंत्र है चूँकि इस्पात कारखाना देखने में ज्यादा दिलचस्पी थी नहीं तो सुबह एक गाड़ी किराये पे लेकर मैथन बांध घूमने निकला उसके बाद नेहरू उद्यान गया फिर वापिस लौटते समय अचानक एक भोंपू का स्वर हुआ, समय देखा तो ०५ बज रहे थे एक फाटक सामने था और एक जनसैलाब सा उमड़ पड़ा था। इससे पहले कभी किसी कारखाने के पास मैं कभी रहा नहीं था तो कारखाने से निकलते जनसैलाब को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया , दोपहिया और चौपहिया वाहनों के सागर को बहते देखकर मैं अभिभूत हो उठा गाडी वाले से पूछा ये क्या जगह है तो उसने बताया की ये "टनल द्वार" और आप इसको इस्पात संयंत्र के सामने खड़े हैं मुझे प्रभावित देखकर गाड़ी वाले ने ये बताया की इस कारखाने के - प्रवेश एवं निकास द्वार हैं और कारखाने में करीब १०००० लोग काम करते हैं ।किसी भी अन्य इंसान जिसने ऐसे कारखाने देखे होंगे उसके लिए ये भोंपू का बजना एक सामान्य सी चीज होगी पर मेरे जैसे निजी इकाई में काम करने वाले आदमी के लिए जिसने घुमक्कड़ी तो बहुत की थी पर कभी कारखाने नहीं देखे ये एक अविस्मरणीय पल था इसके बाद मैं "टनल द्वार" से "स्कोब द्वार" तक सड़क से कारखाने को देखता गया इसको इस्पात संयंत्र तभी से मेरे दिमाग में बैठ गया था संयोगवश उस समय मैंने ०३ लिखित परीक्षाएं दी हुई थीं जिसमे से "सेल" का मेरा साक्षात्कार का न्योता गया जो फरवरी २०१२ में होना था चेन्नई में समूह वार्ता के बाद जब साक्षात्कार लिए मैं प्रस्तुत हुआ तो मुझे पहला सवाल यही पूछ लिया गया की आप मध्य प्रदेश के निवासी हैं आपने कभी कोई इस्पात संयंत्र देखा है या आप इस्पात कारखाने वालों की जीवनशैली से परिचित हैं? मैंने उनको अपनी इसको इस्पात संयंत्र की यात्रा का अनुभव कह सुनाया तो साक्षात्कारियों ने एक अभियुक्ति की कि इस्पात कारखाने के बारे में आपका सकारात्मक रुख हमें अच्छा लगा साक्षात्कार के बाद मैं इस बात को भूल गया और अपने कार्य में लग गया फिर अप्रैल के प्रथम सप्ताह में नतीजे आये तो मालूम पड़ा की मेरा "सेल" में चयन हो गया है और मुझे "इसको इस्पात संयंत्र" ही मिला है आज मैं घर से हजारों किलोमीटर दूर यहाँ कार्यरत हूँ अपने पूरे जीवन में संयोग का इससे बड़ा उदाहरण मैंने आज तक नहीं देखा ।।

 शब्द संख्या (४८७)

इसको इस्पात संयंत्र में आयोजित कहानी लेखन स्पर्धा में मेरी प्रविष्टि , इसे चौथा स्थान प्राप्त हुआ ॥ यह मेरा प्रथम प्रयास था राजभाषा की किसी प्रतियोगिता में ।।